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पटना के अधिवेशन में पुरातत्वविद ने प्रस्तुत किया तीतिरा के शोध आलेख।भारतीय इतिहास की महत्वपूर्ण उपलब्धि ।

तीतिरा के उत्खनन ने गुप्तों के पतन का खोला पोल ।जीरादेई प्रखण्ड क्षेत्र के राजस्व गांव तीतिरा टोले बंगरा गांव में स्थित तीतिर स्तूप का परीक्षण उत्खनन का पुरातत्विक साक्ष्य भारतीय पुरातात्विक इतिहास को नयी दिशा दिया । उक्त साक्ष्यों का खुलासा पटना में बिहार सरकार के कला एवम संस्कृति विभाग द्वारा आयोजित इंडियन अर्कॉलजिकल सोसाइटी, इंडियन प्री हिस्ट्री एवम क्वाटर्नारी सोसाइटी के त्रिदिवसीय संयुक्त अधिवेशन (6 – 8 फरवरी) में हुआ। यह अधिवेशन बिहार की धरती पर पहली बार हो रही है ।इस अधिवेशन में तीतिरा स्तूप के परीक्षण उत्खननकर्ता पुरातत्वविद शंकर शर्मा ने अपना विशेष शोध आलेख प्रस्तुत किया जिसका शीर्षक था “उतरी बिहार में पुरातात्विक उत्खनन में प्राप्त बाढ़ के अवशेष का प्रमाण” ।

श्री शर्मा ने बताया कि गत वर्ष 2018 में तीतिरा ,जीरादेई ,सिवान का परीक्षण उत्खनन में पुरातत्विक साक्ष्य के रूप में बाढ़ के स्तर का मिलना पूरी उत्तरी बिहार के गुप्तयुगीन पुरातात्विक सन्निवेश का पतन के कारण को उजागर करता है । उन्होंने बताया कि बाढ़ के कारण ही गुप्तयुगीन पुरातात्विक साक्ष्य नष्ट हुए होंगे। पुरातत्वविद शंकर शर्मा ने कहा कि तीतिरा के उत्खनन से प्राप्त बाढ़ के जमाव के साक्ष्य से पूरी उत्तरी बिहार या सम्पूर्ण उत्तरी बिहार के प्रारंभिक ऐतिहासिक गुप्तयुगीन लोगों के सन्निवेश का अवसान होने के कारण का पता चला । बाढ़ इतना विनाशकारी रहा होगा कि उस समय के सभी प्रकार की व्यवस्थाएं जलमग्न हो गई होंगी। लगभग 500 किलोमीटर से भी अधिक लंबे एवम् नेपाल की संपूर्ण तराई क्षेत्र को प्रभावित किया होगा। क्यूंकि तितिरा के साथ साथ अन्य स्थलों को बलिराजगढ़ (मधुबनी), वैशाली एवम् पांड ( समस्तीपुर) में भी उसी जमाव का साक्ष्य मिला है। श्री शर्मा ने बताया कि चीनी बौद्ध तीर्थयात्री फाहियान तथा परवर्ती भ्रमणकर्ता ह्वेनसांग द्वारा जिन क्षेत्रों के लोगों के जीवन व्यवस्था ,उनका रहन -सहन की चर्चा की है उससे दो अलग स्वरूपों का पता चलता है। जिसमें फ़ाहियान ने वैशाली एवम् संपूर्ण क्षेत्र को उस समय उत्कृष्ट स्वरूप में रहन सहन की चर्चा की है वहीं ह्वेनसांग द्वारा लगभग दो शताब्दी के बाद सबका विनिष्ट हो जाने की स्वरूप का चर्चा करना तीतिरा के पुरातात्विक अवशेष को प्रमाणित करता है । श्री शर्मा ने इस स्थल के पूरा भू -भौतिकी स्वरूप का भी चर्चा किया जिसका आधार आईआईटी रुड़की के भूगर्भ वैज्ञानिकों द्वारा इस क्षेत्र में किये गए शोध कार्य के संदर्भ को बनाया ।श्री शर्मा ने अधिवेशन में बताया कि अबतक प्राचीन भारतीय इतिहास के अध्ययन में गुप्त युग (320-550 ई०) का अंत विदेशी आक्रमण एवम् आपसी सामाजिक मतभेद एवम् विषमता को बताया जाता रहा है। इस मत को मानने वालों में मूर्धन्य इतिहासकार प्रोफेसर रामशरण शर्मा एवम् डी ० एन ० झा का इतिहास लेखन रहा है। परन्तु उतरी बिहार के इस तीतिरा के साथ साथ अन्य स्थलों से बाढ़ का प्रमाण मिलना वैज्ञानिक सत्य की ओर इशारा करता है।

अब पुरातत्त्व विज्ञानियों को इस साक्ष्य को महत्वपूर्ण स्थान देना होगा। वैज्ञानिक ,पुरातात्विक एवम ऐतिहासिक तीनों दृष्टिकोण से काफी महत्वपूर्ण है। इस सम्बंध में सिवान के शोधार्थी कृष्ण कुमार सिंह ने बताया कि तीतिरा में स्थित तीतिर स्तूप की क्षैतिज उत्खनन करा दिया जाय तो सिवान का प्राचीन इतिहास उजागर हो जाएगा तथा विश्व के इतिहास में यह क्षेत्र पुरातात्विक साक्ष्यों का महत्वपूर्ण स्रोत बनेगा ।

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