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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला : दो बच्चों से ज्यादा पैदा करने पर नेता नहीं लड़ पाएगा निकाय चुनाव

सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया है कि दो बच्चे से ज्यादा पैदा करने वाला नेता निकाय और पंचायत चुनाव नहीं लड़ पाएगा। तीसरे बच्चे का जन्म होते ही पंचायत का चुनाव लड़ने वाला उम्मीदवार स्वतः ही चुनाव लड़ने के अयोग्य हो जाएगा। इसके साथ ही पंचायत में सदस्य या सरपंच के पद से भी वह अयोग्य होगा।

बताते चलें कि ओडिशा के ट्राइबल सरपंच ने दो बच्चों को नीति का पालन करने के लिए अपने एक बच्चे को गोद दे दिया था। इस मामले में चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया रंजन गोगोई, जस्टिस एसके कौल और केएम जोसफ की बेंच ने कहा कि पंचायत राज एक्ट की मंशा उस व्यक्ति को पंचायत चुनाव लड़ने से रोकने या पंचायत में कोई पद धारण करने से रोकती है, जिसके तीन जीवित बच्चे हैं।

सीजेआई के नेतृत्व वाली बेंच ने कहा कि इस कानून का मकसद एक परिवार में जन्म लेने वाले बच्चों की संख्या को नियंत्रित करना है। न कि हिंदू एडॉप्शन एंड मेंटिनेंस एक्ट के तहत मिलने वाले लाभों को प्रतिबंधित करना। बताते चलें कि इस मामले में मीनासिंह मांझी ने ओडिशा हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती दी थी। दरअसल, उनके तीसरे बच्चे के जन्म होने के बाद नुआपाड़ा जिले की पंचायत में उन्हें सरपंच के पद से कोर्ट ने अयोग्य घोषित कर दिया था। उनके दो बच्चों का जन्म 1995 और 1998 में हुआ था। फरवरी 2002 में वह सरपंच बने थे और इसके बाद अगस्त 2002 में उनके तीसरे बच्चे का जन्म हुआ था, जिसके बाद उन्हें सरपंच के पद को छोड़ना पड़ा था।

उनके वकील पुनीत जैन ने तर्क दिया कि मांझी ने सितंबर 1999 में अपने पहले बच्चे को गोद दे दिया था। हिंदू एडॉप्शन एंड मेंटिनेंस एक्ट के तहत एक बार बच्चे को गोद दे देने के बाद वह बच्चा मूल परिवार का सदस्य बन जाता है। इस तरह से मांझी दो बच्चों की नीति का पालन करते हुए सरपंच के पद पर बने रहने के योग्य हैं। जैन ने तर्क दिया कि मांझी तीन बच्चों के बायोलॉजिकल पिता हैं, लेकिन कानूनी तरीके से उनके दो ही बच्चे हैं क्योंकि पहले बच्चे को उन्होंने दूसरे परिवार को गोद दे दिया था। लिहाजा, वह ओडिशा ग्राम पंचायत राज एक्ट के द्वारा तय नियमों में शिकायतकर्ता हैं।

इस मामले में बेंच ने कहा कि हमें नहीं पता कि इस कानून का मकसद पंचायत सदस्यों और सरपंच को पूरे भारत में दो बच्चों की नीति का पालन करते हुए रोल मॉडल बनाने का है या नहीं। मगर, विधायी मंशा से स्पष्टतौर पर लगता है कि यह पंचायत के पद के लिए होने वाले चुनाव को लड़ने वाले उम्मीदवारों के बच्चों की संख्या को दो पर ही सीमित रखना चाहता है।

इस पर वकील जैन ने तर्क किया कि यदि किसी व्यक्ति को जुड़वां या तीन बच्चे एक साथ होते हैं, तो क्या उसे भी पंचायत के चुनाव लड़ने से रोका जा सकता है? इस पर बेंच ने कहा कि यह स्थिति इस मामले में लागू नहीं होती है। इसके साथ ही जुड़वां या तीन बच्चों का एक साथ जन्म होना दुर्लभ मामला है। यदि इस तरह का कोई मामला कोर्ट के सामने लाया जाता है, तो बेंच इस पर सही फैसला लेगी।

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