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भारतीय होने पर गर्व महसूस करा रही ‘परमाणु’

प्रशांत रंजन: हमारे बीच कई ऐसे लोग होते हैं, जो देश-समाज की भलाई के लिए अपना जीवन समर्पित कर देते हैं। इनमें से कितने ऐसे होते हैं जिन्हें हम या हमारी अगली पीढ़ी नहीं जान पाती है। लोग अपने देश-समाज के उन अनजाने नायक/नायिकाओं के बारे में जानें, इसमें सिनेमा एक प्रभावी माध्यम हो सकता है। अभिषेक शर्मा निर्देशित ’परमाणु- दी स्टोरी आॅफ पोखरन’ ने यही किया है। इस फिल्म के बनने से पहले देश को बस इतना पता था कि 1998 में भारत ने परमाणु परीक्षण कर दुनिया को अपनी शक्ति का एहसास करा दिया था। फिल्म ने परमाणु परीक्षण की चुनौतियों, जोखिम, तनाव तथा इस काम में लगे निष्ठावान नायकों के समर्पण को विश्वसनीय तरीके से प्रस्तुत किया है। ’मद्रास कैफे’, ’नीरजा’, ’एअरलिफ्ट’ जैसी फिल्में भी इसी कड़ी का हिस्सा हैं। दरअसल, सिनेमा विधा की यही सफलता है।

1995 में दूसरे देशों की बढ़ती परमाणु शक्ति देखकर भारत के उच्च अधिकारी चिंतित होते हैं, तो आश्वत रैना (जाॅन अब्राहम) नाम का एक आईएएस अधिकारी उन्हें परमाणु परीक्षण करने का सुझाव देता है। लेकिन, लापरवाह व लालची लोगों से भरे सिस्टम के लोग आश्वत के सुझाव का न सिर्फ मजाक उड़ाते हैं, बल्कि उसको सेवा से निलंबित भी करा देते हैं। तीन साल बाद सरकार बदलती है और आश्वत को हिमांशु शुक्ला (बोमन ईरानी) के रूप में एक उचित सीनियर मिलता है। फिर शुरू होती है परमाणु परीक्षण को अंजाम देने की तैयारी।

निर्देशक अभिषेक शर्मा ’परमाणु’ से पूर्व ’तेरे बिन लादेन’ बनाकर अपनी प्रतिभा साबित कर चुके हैं। ’परमाणु’ के लिए किया गया विस्तृत शोधकार्य फिल्म में दिखता है। परीक्षण की तकनीक, व्यवस्था, टीम, लालफीताशाही व पारिवारिक द्वंद्व को संतुलित रूप में प्रस्तुत किया गया है। लेकिन, फिल्म के व्यावसायिक कोण को ध्यान में रखकर फिल्मकार ने सिनेमाई छूट (सिनेमैटिक लिबर्टी) ली है। कहानी की बुनावट में तथ्य को यथावत रखते हुए रहस्य, रोमांच, नाटकीयता व कल्पना को समाहित किया गया है।

 

जैसे परीक्षण टीम व अमेरिकी उपग्रह के बीच खींचातानी का खेल हो, अश्वत का पारिवारिक पक्ष हो, योगेंद्र टिकू का भुल्लकड़पन हो या बोमन का विनोदी अंदाज। यह सब मनोरंजन की दृष्टि से जोड़े गए हैं। वरना पोखरन के ऐतिहासिक घटना का अगर साधारण तरीके से फिल्मी दास्तावेजीकरन होता, तो यह एक डाक्युमेंटरी बन जाती। सेवन क्युद्रस और संयुक्ता चावला शेख के साथ मिलकर अभिषेक ने कहानी लिखी है।

उपकथा के रूप में अश्वत के परिवार को दिखाया है। अच्छी बात यह रही कि उपकथा में समय नष्ट नहीं करते हुए, उतना ही दिखाया, जितना मुख्य कथा के लिए जरूरी था। आरंभ में कहानी स्थापित करने में निर्देशक ने अच्छा समय ले लिया। बाद में कथा को सपाट एवं नीरस होने से बचाने के लिए पाकिस्तानी व अमेरिकी जासूसों का किरदार सृजन किया गया। इन किरदारों ने अंत तक फिल्म में तनाव बनाकर रखा। परिणाम यह हुआ कि 1998 की असल घटना पता रहने के बावजूद, अंतिम मिनट तक दर्शक अपलक फिल्म देखते रहे। यह लेखन टीम की सफलता है।

सूक्ष्मता का एक उदाहरण देखिए। नासा के नियंत्रण कक्ष में एक वैज्ञानिक अमेरिकी सेटेलाइट लैक्रोस की निगरानी करता है। वह अपने हाथ में एक स्पंज गेंद रखे हुए है, मानो वह रक्तचाप का रोगी हो। गौर करने वाली बात है कि उस गेंद पर विश्व का मानचित्र बना हुआ है। मतलब यह हुआ कि अमेरिका पूरी दुनिया को अपनी मुट्ठी में कैद करना चाहता है। ऐसे ही सूक्ष्म बिंब दृश्यों में जान डाल देते हैं।

सिनेमैटोग्राफर जुबिन मिस्त्री ने राजस्थान के रंग को बारीक ढंग से परदे पर उतारा है। ऊपर से दिव्य कुमार का ’थारे वास्ते माही रे…’ गीत राजस्थान के रंग को और चटख बना देता है। सचिन-जिगर और जीत गांगुली का संगीत फिल्म के टोन से मिलता है।

जॉन इस फिल्म के सह निर्माता भी है। अभिनय के अलावा उन्होंने ‘विक्की डोनर’ व ‘मद्रास कैफे’ जैसी उद्देश्यपरक फिल्मों का निर्माण किया है। फैशन जगत के चमक—दमक में रहकर भी जॉन के व्यक्तित्व में सामाजिक एवं नागरिक दायित्यों के प्रति बोध है। इसकी झलक उनकी निर्मित फिल्मों में मिलती है। जॉन को बधाई। उनसे भारतीय सिनेमा को उम्मीदें हैं।

सांगोपांग यह है कि कथा, दृश्य व संगीत के मिश्रण ने ’परमाणु’ को दर्शकों के दिल में राष्ट्रप्रेम को स्पंदित करने वाली फिल्म के रूप में सृजित किया है। सिनेमा प्रेम से परे अगर आपको भारतीय होने पर गर्व है, तो ‘परमाणु’ देखने पर भी गर्व होगा।

(✍ लेखक बिहार के युवा फिल्म समीक्षक है व विश्व संवाद केंद्र, पटना व पाटलिपुत्र सिने सोसाईटी से संबद्ध है )
( इनपुट : परमार डाॅट काॅम: सीवान )

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