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राजदेव रंजन :- बस इतना याद रहे एक साथी और भी था !

डी. एस. तोमर की कलम से..

वरीय पत्रकार/प्रबंध निदेशक
तोमर’स मीडिया प्राइवेट लिमिटेड
बिहार

13 मई 2016 की ओ मनहूसियत भरी शाम जो पत्रकारिता जगत के इतिहास में काला दिवस के नाम से दर्ज हो गई ।
तपती दोपहर के बाद थोड़ी सी सुकून भरी शाम थी । सभी लोग लगभग अपने अपने कार्यो को निपटा कार्यालय से आवास के तरफ लौट रहे थे ।उसी सुकून भरी शाम में एक नौजवान भी अपने कार्यालयी कार्यो को निपटा पारिवारिक दायित्वो का निर्वहन करने के लिए कार्यालय से घर के तरफ निकाल ।रोजाना की तरफ पत्नी बेटा और बेटी घर मे पति और पापा रूपी उस नौजवान का इंतजार कर रहे थे । कार्यालय से निकलते वक्त उस नौजवान के बच्चों ने अपने पापा से कई सामानों की फरमाइश कर बैठे होंगे जैसे कि आम तौर सभी बच्चे अपने अपने पिताजी से करते है ।

काम निपटाने के बाद घर को लौट रहे उस नौजवान को रास्ते में कुछ लोग चिरपरिचित अंदाज में रोकते हैं, कुछ बातें करते हैं और फिर बंदूक निकाल उसके सर और सीने में गोली दाग देते हैं । सफेद शर्ट, ब्लू जीन्स में वह हंसमुख चेहरा लिए नौजवान अपने कर्तव्य के प्रति वीरगति को प्राप्त हो जाता है ।
जी हां मैं बात कर रहा हूं कलम के सिपाही और अपनी पत्रकारिता में अमिट छाप छोड़ने वाले सीवान के पत्रकार स्वर्गीय राजदेव रंजन जी का !

Rajdeo ranjan file photo

सीवान की पत्रकारिता में राजदेव रंजन का नाम एक अलग विचारधारा सहित कटु सत्य कलम के सिपाही के रूप में माना जाता रहा है । स्वर्गीय राजदेव रंजन शिक्षा ग्रहण करने के बाद सीवान न्यायालय में वकालत की शुरुआत की थी । लेकिन पत्रकारिता के क्षेत्र में अलग मुकाम हासिल करने वाले राजदेव रंजन का मन वकालत में कहां लगने वाला था । वकालती पेशा को दूसरी श्रेणी में रखते हुए स्वर्गीय रंजन ने पत्रकारिता को अपना प्रथम चाह बनाया और देखते देखते पत्रकारिता जगत अपनी चमक बिखेर दी।

स्वर्गीय राजीव रंजन के पत्रकारिता के मुख्य धारा के समय सीवान की परिस्थिति सामान्य नही थी चारो तरफ एक अलग तरह का माहौल बना हुआ था ।उस माहौल में रहकर पत्रकारिता करना एक चुनौतीपूर्ण कार्य था । लेकिन उस तरह के परिस्थितियों से राजदेव रंजन ने एक नही मानी और अपने पत्रकारिता धर्म को जोशोखरोश के साथ निभाते रहे ।

अपने अलग और बेवाक तरह के लेखनी के लिए मशहूर राजदेव हमेशा से सिवान में चर्चा के विषय बने रहे है । कई बार उनके साथ अव्यवहारिक घटनाओ को अंजाम दिया गया । उन्हे डराने और धमकाने का काम किया गया लेकिन स्वर्गीय राजदेव रंजन उन डर और धमकियों को किनारा करते हुए अपनी लेखनी और बेवाक पत्रकारिता बरकरार रखी ।

परिस्थिति और पत्रकारिता के बीच उलझे राजदेव रंजन अपने खुले विचारधारा और जज्बाती सोच के साथ पत्रकारिता करते रहें । लेकिन स्वर्गीय राजदेव रंजन को लगातार निशाने पर रखने वाले अपराधियों ने उन्हें अपना शिकार बना लिया । 13 मई की वह काली शाम जब ऑफिस से निकले तभी पूर्व से घात लगाए अपराधियों ने राजदेव रंजन का रेकी करते-करते सीवान के स्टेशन रोड स्थित गुलजार बाजार फल मंडी मोड पर गोलीमार मौत के घाट उतार दिया ।

आज राजदेव रंजन इस दुनिया में नहीं है । उनको हमारा साथ छोड़े विगत 2 साल हो गया । लेकिन जिस बहादुर से उन्होंने पत्रकारिता को विकट परिस्थिति में जीवित रखा इसके लिए वह बधाई के पात्र हैं। स्वर्गीय रंजन का आदर्श जज्बात, जोश और सम्मान आज भी युवा पीढ़ी के सीने में जीवित है । उनके प्रति अपार श्रद्धा रखने वाले समस्त पत्रकार आज भी उनके आदर्शों पर चलने की बात करते हैं । विकट परिस्थिति में पत्रकारिता का आदर्श बचाने वाले उस वीर कलम के सिपाही को हमारी तरफ से शत शत बार नमन है ।

अंत में एक बार फिर उन्हें याद करते हुए उनके पत्रकारिता धर्म के आदर्श को आने वाली पत्रकारिता पीढ़ी में जीवित रखने का संकल्प लेते हुए, हमें उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करनी चाहिए। और साथ में काम कर रहे पत्रकार तथा आने वाले नई पीढ़ी के पत्रकारों को यह जरूर याद दिलाना चाहिए कि
राजदेव रंजन:- एक साथी और भी था ।

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