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समाज में महिलाओं पर हो रही हिंसा पर एक बेटी का दर्द, जरूर पढ़ें

न्यूज़ डेस्क:

जन्म से पहले मारल जाता
उ बेटी के जारल जाता
इ का होता ए बिधाता
हमारा त कुछु ना बुझा ता

बेटी हई घर के लक्ष्मी
बेटी हई जग के जननी
तब काहे गर्दन कटाता
इ का होता ए बिधाता
हमारा कुछु ना बुझा ता

भइल बा का बेटीयन से गलती
जवना के साजा ई दिया ता
हमरा त कुछु ना बुझा ता

माई हो के बेटी के मारेलु
नारी होके नारी के जारलु
माई तहरो माया कहा जाता
हमरा कुछु ना बुझा ता

बेटीये से जग बा बेटीये से अस्मा

बेटीये हम बा बेटीये तहो

बेटीये से धरती चलता

इ का होता ए बिधाता

हमारा कुछु ना बुझा ता

लेखिका :अंशु आर्या (मोती ) संठी (रघुनाथपुर)

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