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​हमने गाँधी से सीखा ! 

सफाई करते मनोज कुमार दुबे

मनोज कुमार दुबे का स्वच्छ्ता अभियान और गांधी के आदर्शों पर एक blog:——

पोरबंदर गुजरात से निकल कर ब्रिटेन और फ़िर भारत की भूमि से दक्षिण अफ्रीका टालसटॉय फॉर्म , सेंट पीट्सबर्ग और पुनः भारत आते आते एक साधारण सा इंसान मोहन दास एक विचार बनकर उभरे , उन दिनो भारत  अपने स्वतंत्रता के लिये छटपटा रहा था नेतृत्व के अभाव मे स्वतंत्रता के  आंदोलन को ब्रितनिया हुकूमत अपने पैरो तले रौद्र रही थी ! काँग्रेस के पास नेता तो थे पर उनकी नियत पर भारतीय लोगो को भरोसा नही था क्यों कि इस पार्टी के संस्थापक ए ओ हुय्म स्वयं एक रिटायर ब्रिटिश सेना के अधिकारी थे ! इन सब के बीच महात्मा गाँधी के अफ्रीका मे हुये  सफल  सत्याग्रह की धमक को हिंदुस्तान के बुद्धिजीवी  लोग समझ गये थे ! इन लोगो के बीच से एक नाम आता है पं राजकुमार शुक्ला का जो बेतिया पश्चिमी चम्पारन के रहने वाले थे ! तीन काठिया नील की खेती के एक्ट और नीलो के अत्याचार से दुखी राजकुमार शुक्ला के सामने इस समस्या को जन आंदोलन और उसके नेतृत्व के लिये महात्मा गाँधी से दिल्ली मे जाकर अनुरोध करना भी गाँधी जी के जीवन की एक महत्वपूर्ण कड़ी के रुप मै देखता हूँ , क्यों कि पहली बार तो गाँधी जी ने भी राजकुमार शुक्ला से चम्पारन  जाने से इंकार कर दिया ! लेकिन राजकुमार शुक्ला भी गाँधी के सामने सत्याग्रही के समान हो गये गाँधी जहाँ जहाँ जाते राजकुमार शुक्ला भी वही रहते एक बार कलकत्ता मे गाँधी जी ने शुक्ला जी से कहा क्यों पीछे पड़े हो , तब राजकुमार शुक्ला ने कहा कि गाँधी जी या तो आप चम्पारन चलेंगे या राजकुमार शुक्ला की मृत शरीर जायेगी ! मै आप को बिना लिये चम्पारन नही जाऊँगा और अंततः गाँधी जी को चम्पारन की धरती पर जाना पड़ा और गाँधी जी को देश का सर्वमान्य नेता मानने की प्रक्रिया शुरू हुयी !

बेतिया चम्पारन मे रहते हुये गाँधी जी अक्सर कस्तूरबा गाँधी को मलिन बस्तियों मे भेजते जहाँ उनके रहन सहन को ठीक रखने की सलाह कस्तूरबा गाँधी दिया करती ! स्वच्छता और निरोग के महत्व को गाँधी जी  अपने व्यवहार मे लाने की सलाह देते ! एक वार गाँधी जी एक नदी के किनारे थे जहाँ एक बहूत ही  गंदा कपडा पहने एक महिला उनसे मिली उसके तन पर आधे कपडे थे जब गाँधी जी ने कारण जानना चाहा तो वह महिला अपनी गरीबी और लाचारी का जो वर्णन किया वह गाँधी जी को आत्मामंथन करने पर विवास कर दिया और वही से गाँधी जी सिर्फ तन ढकने भर कपडे का इस्तेमाल करना शुरू कर दिये ! बाद के दिनो मे चरखा और स्वदेशी के आंदोलन मे कही न कही उस महिला की पीडा जो पूरे भारत मे समान रुप से व्याप्त था उसको कम करने की एक कोशिश गाँधी जी द्वारा की गई !

आजादी के आंदोलन मे  1942  के अंगेजों भारत छोडो और करो या मरो के नारों ने लंदन की गद्दी मे हिचकोले लाने शुरू किये और अंततः 15 अगस्त 1947 को भारत आजाद हुआ!

गाँधी जी ने अपना पूरा जीवन देश के लिये न्योछावर कर दिया लेकिन जब पिछले हप्ते 2 अक्टूबर को जब हम लोग उनकी जयंती मना रहे थे तो निश्चित रुप से एक बात हम सब के दिमाग मे था कि महापूरूषो के जीवन से हमे कूछ सीखना चाहिये और जब स्वच्छता का जो अभियान हम सब ने शुरू किया है उसके प्रतिफल को देखते है तो उसके पीछे गाँधी जी की सोच शामिल है  ये वाकई मे गर्व करने जैसा होता है ! हम उनके पदचिह्न पर पूरी तरह  चले न चले पर अपने जीवन मे समाज के कल्याण के लिये  कोई एक अच्छा काम कर दे तो ये गाँधी जी सहित पूरे देश के वीर सपूतों के सम्मान जैसा ही होगा! और अंततः संतोष भी होगा क्यों  कि गाँधी विचार बनकर आज भी जीवित है ! हम सबको उनके बताये रास्ते पर चलने की  कोशिश करनी चाहिये वास्तव मॆ गाँधी जी के प्रति सही मूल्यों मॆ सच्ची श्रधांजलि होगी।

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