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एहसास कहूँ मन का, या फिर सुकून…

जब पास रहती हो तो न जाने क्यूँ ? मन, इतना सुकून महसूस करता है । सच तो ये भी है कि मेरे एहसास केवल तुम्हारे लिए ही है । मन कहता है कि हम एक लिवास की तरह तुम्हारे बदन को ढके हुए है । और सच ये भी है कि लिवास आजकल दिखावे के रूप में है ।
अर्थात्
मैं अपनी ही मोहब्बत का दिखावा हो गया हूँ ।
मैं तेरे बदन पर लिपटा वो पहनावा हो गया हूँ ।।
     
सोचता हूँ , इस दिखावे को दूर कर दूँ । मगर फिर ख्याल आता है कि कैसे उतरूंगा तेरे बदन से । उतर जाऊंगा तो मेरी स्वाभिमान का क्या होगा । अपने आप से नजरे कैसे मिलाऊँगा । कोशिश तो तुमने बहुत की, ताकि मैं और तुम ,हम हो जाए । पर शायद तुमने वक़्त नही दिया । वक़्त के साथ साथ सब सम्भव होता है । शायद ये तुमने ही कहा था कि जो चला गया उसको याद करके अपने आप को नुकसान नहीं पहुचाना चाहिए । काश ! ये तुम भी खुद समझ पाती, तो तुम्हे कोशिश करने की जरुरत नही पड़ती । हम साथ होते , एक साथ होते, जीवन के हर मोड़ पर । कहा जाता है कि रिश्ते बहुत नाजुक होते है, एक बार भूल से भी दरार पड़ जाती है उसे टूटने में वक़्त नही लगता । इसीलिए रिश्तों को जोर से बल्कि तमीज से पकड़ने चाहिए । तुमने तो दोनों में से कुछ नही किया । हर बार पास आता हूँ तुम्हारे, जानती हो मुझे बहुत सुकून मिलता है ।
वक़्त ढूंढ लो, उस वक़्त में कुछ पल ढूंढ लो, उस पल में सिर्फ हम दोनों हो । तुम्हारे साथ बिताए प्रत्येक पल ने मुझे और ज्यादा करीब कर दिया । अब आगे भी बढ़ना है । उस पल को रोकना नही चाहता । पल को पल से जोड़ना चाहता हूँ ।
माफ़ करना, जब भी कुछ लिखने बैठता हूँ , क्यों तुझे ही हर बार लिखता हूँ । कलम उठाता नही कि स्याही दौड़ पड़ती है तेरा नाम लिखने को । कागज का वो हिस्सा जिस पे तू आती है, न जाने क्यों रूह सी उतर जाती है उस हिस्से पर । शायद मेरी हथेलियों को तेरी उंगलियां मिल जाती है, और तुम खुद की एक तस्वीर बना लेती हो मेरे लफ्जों में ।
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