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हम, सफर और हमसफर

रोज की तरह सुबह 9 बजे नींद खुली । वैसे नींद तो रात भर लगी भी नही थी । गाने-बजाने के आनंद के साथ चाय नाश्ता हुआ । फिर मैं और मेरा दोस्त विश्वविद्यालय के तरफ रुख किये । लेकिन एक आवाज कही न कही कानो में गूंज रही थी । “वनारस जाना है आप दोनों को “। हाँ वही पत्रकार, इतने नर्म और विस्वास भरे लफ्जों में कहा कि न चाहते हुए भी हम दोनों अपने आप को नही रोक पाए । दिन भर अपने कार्य करने के बाद शाम 4 बजे हमदोनो घर से स्टेशन के लिए निकल पड़े ।



सफर पर निकल तो रहा था पर हमसफ़र से पिछले 24 घण्टों में बिल्कुल बातचीत न हुई थी । सोचा कि उसका हाल पूछ लूंगा और अपने सफर का खबर देकर निकल जाऊंगा । खबर देना चाहा लेकिन उससे पहले उसकी आवाज में एक बंधन सा महसूस हुआ मुझे । “मेरा भी मन है जाने का”। पर क्या करूँ, कहाँ रहूंगी, कैसे रहूंगी, किसके साथ रहूंगी ? तुमलोग तो लड़के हो कही भी रह लोगे, पर मैं ………।” कहते-कहते चुप हो गयी । तुम मुझे 10 मिनट में कॉल करो । पापा से पूछ कर बताती हूँ । फिर वही अनुमति, पापा तो जाने के लिए अनुमति दे दिए पर मां ने बिल्कुल ही इंकार कर दिया । ऐसी सूचना सुन मन मेरा बैठ गया । एक पल के लिए मेरा मन भी जाने से इंकार करने लगा । पर दोस्त की उपस्थिति ने मुझे लौटने से रोक लिया । कैसे मनाता मन को एक तरफ एक विस्वास भरी आवाजे गूंज रही थी तो दूसरी तरफ दोस्त का साथ । कैसे इन दोनों का साथ छोड़ देता मैं । लेकिन मन अपने हमसफ़र के तरफ झुका रहा । काफी देर खामोश रहा । न कुछ बोल पा रहा था और न ही कुछ सुन पा रहा था । एक के बाद एक न जाने कितने छोटे बड़े स्टेशन गुजरने के बाद ट्रेन मुग़लसराय स्टेशन पहुची । स्टेशन पर काफी चहल पहल लेकिन मन फिर भी उदास । क्या करूँ जिससे मन लगे । मन मेरे पास लौट सके । यही विचार करते स्टेशन की सीढ़ी पर बैठ गया । वही सीढ़ी पर घण्टों बैठा रहा । और मन सोच में डूबा जा रहा था “कैसे मनाई होगी अपने मन को” । हर बार की तरफ जवाब बिल्कुल खामोश । उसे भी पता है अभी तक उसे हमसफ़र मानते आया हूँ और ये मानना मेरा उचित भी है । काफी रात हो चुकी थी सीढी पर बैठे बैठे । स्टेशन के बाहर निकल थोड़ा घूमने टहलने के बाद चाय वगैरह से मन को मनाने का प्रयास किया । लेकिन फिर हर बार की तरह असफल रहा । क्या करूँ ,कुछ समझ नही आ रहा था । कुछ कहने और कुछ बोलने की आज़ादी हमदोनो ने खुद गवा दी । एक ऐसा रिश्ता हो चुका था हमदोनों के बीच जहां सिर्फ मैं उसे अपना हमसफ़र मानता था । जीवन संगिनी तो बना नही सकता । हमदोनो के बीच एक ऐसी कसम की दीवार खड़ी हो चुकी थी जिसे कभी मैं तोड़ नही सकता । जीवन संगिनी तो नही बना सकता उसे पर हमसफ़र उम्र भर रहेगी । एक अजीब सा एहसास था मेरे मन मे । उसके पास से मन बहुत सुकून में रहता था । शायद इसका वजह भी बता दिया था उसे । बहुत प्रयास के बावजूद भी मन निरंतर उससे हारता चला गया । उस पर मन मेरा बिल्कुल सो चुका था । एक ऐसी सुकून की नींद जिसे जगाया नही जा सकता । 11 बज चुके थे, दोस्तो की हलचल ने मेरी सोच को दूसरी दिशा दे डाली । अब वनारस भी पहुचना था । सभी दोस्तों ने मुग़लसराय से वनारस के लिए फिर एक सुहाने सफर का शुरुआत किया ।

सफर का अगला पड़ाव भी लिखूंगा,

यही तो है जिससे अपनी मन की बात बोलता हूं और सुनाता भी हूं ।

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