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गुरमेहर! गांधीजी ने कहा था, ‘डरो मत’

शहीद की बेटी के नाम एक ख़त: ‘अभय व्यक्ति राष्ट्र की सबसे बड़ी निधि है और उसका अभिप्राय केवल शारीरिक साहस से ही नहीं, बल्कि मानसिक निर्भयता से भी है. हमारे इतिहास के आरंभ में ही चाणक्य और याज्ञवल्क्य ने कहा था कि जन-नेताओं का कर्तव्य जनता को अभयदान देना है.’

प्रिय गुरमेहर!

केंद्रीय मंत्रियों, सत्ता के नशे में बौराए लोगों, सोशल मीडिया ट्रॉल और कैंपसों में मौजूद गुंडों की लंपट मुखरता से डरकर तुम कहीं भी जाओ, तुम्हारे मन में पैदा किया गया यह भय तब भी रहेगा. भागने पर यह तुम्हारा पीछा करेगा.

इसके अलावा, हमारे घरों में तमाम बेटियां तब भी रहेंगी. वे सब कॉलेज से निकलेंगी और इसी तरह कहना चाहेंगी कि मैं फलां से नहीं डरती. वे अपने जीवन की घटनाओं पर अपनी राय रखना चाहेंगी.

‘आइडिया आॅफ इंडिया’ इस आज़ादी की न सिर्फ़ सुरक्षा करता है, बल्कि तुम्हें भी सुरक्षित रखने की गारंटी देता है. भारत की रचना करने वाले महापुरुषों ने तुम्हारे लिए, हम सबके लिए कुछ संदेश छोड़े हैं, जो इस प्रकार से है…

पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने अपनी किताब ‘राष्ट्रपिता’ में लिखा है, ‘राजनीतिक स्वतंत्रता ने एक नया रूप ग्रहण किया और उसमें नए-नए विषयों का प्रवेश होने लगा. जो कुछ भी गांधीजी ने कहा उसमें से अधिकांश को हमने या तो केवल अंशत: स्वीकार किया या कभी-कभी नहीं किया. किंतु यह सब गौण था. उनके आदेश का सार यह था कि सदा जनता के कल्याण को दृष्टि में रखते हुए अभय और सत्य के साथ काम करो. हमें पुराने ग्रंथों में सिखाया गया था कि अभय व्यक्ति राष्ट्र की सबसे बड़ी निधि है और उसका अभिप्राय केवल शारीरिक साहस से ही नहीं, बल्कि मानसिक निर्भयता से भी है. हमारे इतिहास के आरंभ में ही चाणक्य और याज्ञवल्क्य ने कहा था कि जन नेताओं का कर्तव्य जनता को अभयदान देना है. किन्तु ब्रिटिश राज्य में भारत में सबसे प्रमुख भावना भय की थी- एक सर्वव्यापी, दुखदायी और गला घोंटने वाला भय- फ़ौज का भय, पुलिस का भय, कोने-कोने में फैली हुई ख़ुफिया पुलिस का भय, अफसरों का भय, महाजन का भय और उस बेकारी तथा भूख का भय जो हर समय मुंह बाए खड़ी रहती थी. गांधीजी ने अपनी शांत किन्तु दृढ़ आवाज इसी सर्वव्यापी भय के विरुद्ध बुलंद की. उन्होंने कहा, ‘डरो मत.’ किंतु क्या यह बात इतनी सरल थी? नहीं. भय के भूत खड़े हो जाते हैं, जो असली भय से भी अधिक डरावने होते हैं. जहां तक असली भय का सवाल है, जब शांति से उसका विश्लेषण किया जाता है और उसके परिणामों को स्वेच्छा से स्वीकार कर लिया जाता है तो उसका बहुत कुछ डरावनापन नष्ट हो जाता है.’

गुरमेहर, इसलिए तुम डरना नहीं. अपनी बात कहने वालों को हमेशा डराया जाता रहा है. जिस जनतंत्र में हम पैदा हुए हैं, वह हमें यही सिखाता है कि ग़लत धारणाओं के साथ भी हमें अपनी बात कहने का हक़ है. युद्ध बुरा है, यह कहने वाली तुम अकेली नहीं हो. ‘मेरे सपनों का भारत’ महात्मा गांधी के लेखों का संग्रह है.

उसकी शुरुआत में ही गांधी जी लिखते हैं, ‘यदि भारत तलवार की नीति अपनाए तो वह क्षणस्थायी विजय पा सकता है, लेकिन तब भारत मेरे गर्व का विषय नहीं रहेगा. मैं भारत की भक्ति करता हूं, क्योंकि मेरे पास जो कुछ भी है वह उस उसी का दिया है. मेरा पूरा विश्वास है कि उसके पास सारी दुनिया के लिए एक संदेश है. उसे यूरोप का अंधानुकरण नहीं करना है… यदि भारत ने हिंसा को अपना धर्म स्वीकार कर लिया और यदि उस वक़्त मैं जीवित रहा तो मैं भारत में नहीं रहना चाहूंगा.’

यह 1920 में यंग इंडिया में लिखे लेख का अंश है. वे अपनी मौत तक अहिंसा और प्रेम के सिद्धांत पर कायम रहे. आज विचार आपको बलात्कार करने की धमकी दे रहा है, उसी हिंसात्मक विचार ने गांधी की हत्या कर दी थी. यह अलग है कि पूरी वैचारिकी गांधी के बगल खड़ी होने लायक भी नहीं बन सकी.

स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान तीस के दशक में मृदुला साराभाई महिलाओं की आज़ादी के लिए मुखर लड़ाई लड़ रही थीं. प्रो. बिपिन चंद्र लिखते हैं, उनसे महात्मा गांधी ने कहा था, ‘मैंने महिलाओं को रसोईघर से बाहर लाने का काम किया है, अब आपको उन्हें वापस लौटने से रोकने का काम करना है.’

आपको डीयू पहुंचने के लिए पीढ़ियों ने संघर्ष किया है. आपको डीयू पहुंचाया किसने यह दीगर बात है, लेकिन आपको लौटकर नहीं जाना है. सारी दुनिया जानती है कि कैंपस के बच्चे तमाम जड़ताओं से आज़ादी मांग रहे हैं. बस्तर में सुरक्षाबलों द्वारा बलात्कार हो रहा है और दिल्ली में बलात्कार करने की धमकी दी जा रही है. उस आज़ादी से जो डरता है, उसे ज़रूर डरना चाहिए.

डॉ. भीमराव अंबेडकर ने भारतीय हिंदू समाज की आलोचना में लिखा था, ‘हिंदू समाज उस बहुमंज़िला मीनार की तरह है जिसमें प्रवेश करने के लिए न कोई सीढ़ी है, न दरवाज़ा. जो जिस मंज़िल में पैदा हो जाता है उसे उसी मंज़िल में मरना होता है.’

बलात्कार की धमकी देने वाले ये अपराधी उसी हिंदुत्व की मीनार को बचाने के लिए हर कहीं हुड़दंग कर रहे हैं. इस मीनार की बंद दीवारों पर गांधी नामक विचार के ख़ून की छींटें भी हैं. हम सबको इस मीनार में सीढ़ी, दरवाज़े तो लगाने ही हैं, इसकी वे छींटें भी धुलकर साफ़ करनी होंगी जो भारतीय लोकतंत्र को गंदा करने की कोशिश कर रही हैं.

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