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आज़ादी दिलाई,कुछ दिन आज़ाद भी रहा, फिर गुलाम होता चला गया……

मैं अखबार हूँ

कहा जाता है कि शिक्षा के अभाव में लोग अंगूठे का निशान लगाने को मजबूर है।  पत्र पढ़वाने के लिए भी दूसरों के दरवाजे खटखटाने पड़ते थे लेकिन उस समय लोग मेरे वजूद को समझते थे।  प्रतिकूल व्यक्ति का व्यक्तित्व  में  निखार कभी नही आ सकता। व्यक्ति के विकास के साथ साथ ही एक समाज, एक राष्ट्र का विकास सम्भव है। मैंने व्यक्ति में भी विकास सुनिश्चित किया, उनके व्यक्तित्व में भी और समाज के साथ साथ राष्ट्र का भी। हां… यह वही दौर था जब लोगों के पास बातचीत करने का कोई साधन नहीं था। उस पर भी अंग्रेजो के अत्याचारों का शिकार, असहाय लोग चुपचाप सारे अत्याचार सहते थे।  न  सुनने वाला कोई था और न ही उनको कोई सुनाने वाला।  वे कहते भी तो किससे और कैसे ? पूरा रास्ता ही बंद था। हर कोई उसी प्रताड़ना को झेल रहा था । ऐसे में मेरे जन्म ने लोगो को हिम्मत दी, उनमे ढांढस बंधाया।  यही कारण था की क्रांतिकारियों के एक एक लेख जनता में नए नए जोश और देशभक्ति का संचार करते थे।

ऐतिहासिक पन्नो के तरफ  गौर किया जाए तो राजाराम मोहन रॉय मेरे जन्म को लेकर अपने मक़सद को लोगो  से परिचित कराया था कि – “मेरा मक़सद मात्र इतना हैं कि जनता के सामने  बौद्धिक निबंध उपस्थित करू जो उनके अनुभव को बढ़ाने और सामाजिक प्रगति में सहायक सिद्ध हो।  मैं अपने शक्ति भर शासक को उनकी प्रजा की परिस्थितियों का सही परिचय देना चाहता हूँ और प्रजा को उनके शासकों द्वारा स्थापित विधि-स्थापित से परिचित कराना चाहता हूँ ताकि जनता को शासन अधिकाधिक सुविधा दे सके।  जनता उन उपायों से अवगत हो सके जिनके द्वारा शासकों से शिक्षा पायी जा सके और अपनी उचित मांगे पूरी कराई जा सके।”

पूरी दुनिया,एक-एक देश को मालूम हैं कि जब वे गुलाम थे ,उनकी सहायता किस प्रकार की गयी थी. मुझे प्रकाशन कराने वाले कितनी यातनाये सही ? पर वे आज़ाद हो गए और मैं धीरे धीरे गुलाम होता गया ,किसी सरकारी संस्था का तो किसी विज्ञापन संस्था का। खबर मुझसे दूर होते चले गए और भरता गया सरकारी गतिविधियां और तरह तरह के विज्ञापन। कहने मात्र है कि आज मैं जितना स्वतंत्र और मुखर दिखता हूँ  ,आज़ादी की जंग में मैं उतनी ही बंदिशों और पाबंदियों में बंधा हुआ था। न तो मुझमे मनोरंजन से सम्बंधित कुछ लेख थे और न ही किसी की कमाई का जरिया ही।  मैं आज़ादी के जाँबाजो का एक हथियार और माध्यम के रूप में था। जो उन्हें लोगों तथा उनसे सम्बंधित घटनाओं से जोड़े रखा था। आज़ादी की लड़ाई का कोई भी ऐसा योद्धा नही था ,जिसने मेरे जरिये अपनी बात कहने का प्रयास न किया हो।  गाँधी ने भी “हरिजन” व “यंग इंडिया” के नाम से मुझे प्रकाशन किया तो मौलाना अबुल कलाम आज़ाद “अल-हिलाल” नाम से प्रकाशित। ऐसे और भी कितने उदाहरण हैं जो साबित करते हैं कि पत्र-पत्रिकाओं की आज़ादी की लड़ाई में कितनी महती भूमिका थी।

 

पर… “आज के दौर में लोग मुझे अखबार न कहकर बाज़ार ही कहते तो बेहतर रहता”। आज के वक़्त में देखे तो मेरे हालात कुछ इस तरह दिखाई देंगे। आज, भारत में सरकार के जरिये या मेरे (अखबार)  मालिकों के जरिये या फिर विज्ञापन दाताओं के दबाये जाने का महसूस होता है। लेकिन मैं कभी भी इस बात का दुःख नही माना की मेरी नीतियों के मुताबिक ही खबर दी जाए लेकिन मुझसे जब सही खबरे छीनी जाती है या यूँ कहे की दबायीं जाती तो बहुत तकलीफ होती है। काफी उदास हो जाता हूँ क्योंकि इस कार्य से दुनिया की घटनाओं के बारे में सही राय बनाने का एकमात्र साधन जनता से छीन जाता है।

विश्व स्तर पर भी यही हालात है क्योंकि जर्मनी और इटली में मैं तो पूर्ण रूप से सरकार का गुलाम हूँ।  जो सरकार चाहती है वही खबर मुझ तक पहुचते हैं। इंग्लैंड की बात की जाये तो बिलकुल भारत की तरह ही नीतिया है।  सही ख़बरों को दबाया जाता है क्योंकि ब्रिटिश सरकार भी मेरे अधिकार में खुलेआम हस्तक्षेप नही करती। जिस तरह भारतीय पत्रकार सरकार की कुछ तौर तरीके मान सही खबर दबा देते है ठीक उसी प्रकार वहा भी।

 

बस….  एक उम्मीद ही रह गयी है कि ख़बरों को दबाने की प्रवृति न बढ़कर उन्हें उजागर किया जाए ,जिसे कभी राजाराम मोहन रॉय,गाँधी,गणेश शंकर विद्यार्थी तथा और कई अन्य पत्रकारों ने सपना देखी थी।

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